शनिवार, 19 जनवरी 2013

कैसी-कैसी पतंगबाजी

देखिए हाल ही में मकर संक्रांति मनी और पतंगबाजी भी खूब हुई, लेकिन देष में महंगाई की पतंगबाजी ᅤंचाई पर ही है। महंगाई, गरीबों की जिंदगी की पतंगें काट रही है और उसकी डोर है हमारे ‘मौन-मोहन’ के पास, जो हर बार कोई निर्णय लेने के पहले पड़ोसी से पूछते हैं, ठीक है। महंगाई से आज जितनी डर नहीं लगती, उतनी सरकार से लगने लगी है, क्योंकि महंगाई का चाबुक तो उन्हीं के पास है। ठीक है, कहने वाले हमारे कर्णधार, क्यों महंगाई को ‘ठीक’ नहीं कर पाते। मैंने तो लोगों को कहते सुना है, डायन है महंगाई, लेकिन अंतःमन में झांकने से समझ में आता है कि महंगाई तो बेचारी है, जिस पर दाग लगा है, जबकि दाग लगाने वाले तो कोई और है। महंगाई भी डायन कहने पर घड़ियाली आंसू बहाती है, उसे तो सरकार के साथ मिलकर जनता के सीने में मूंग दलने में ही मजा आता है।
जब पतंगबाजी की बात चली है तो मकर संक्रांति में मैंने पतंग की डोर थामने का मन बनाया। मैं बड़े उत्साह से छत पर गया, वहां आसमान में देखा तो कई पतंगें हवा में हिलोरें मार रही थीं। मैंने जो पतंग आकाष में उड़ाने का मन बनाया था, वह तो आकाष में लहराते अनेक पतंगों के सामने बौनी लगने लगी। कुछ समय तक मैं आसमान में निहारते रहा। इसी बीच मैंने देखा कि एक पतंग महंगाई की थी। पतंग ने जिस विषाल क्षेत्र को घेर रखा था, उसमें मेरी पतंग की कोई बिसात न थी। मैं खुद को कोसने लगा कि महंगाई पतंग के सामने, हम तो  टूटपूंझिए बनकर रह गए। मैंने सोचा, चलो कहीं और टᆰाई करते हैं।
आसमान की दूसरी ओर निगाह डाली तो वहां उससे बड़ी पतंग नजर आई, वह थी ‘भ्रश्टाचार’ की। भ्रश्टाचार की पतंग की खासियत देख तो मैं सन्न ही रह गया, क्योंकि इसमें इतनी गहराई दिखी कि वह कितनों को अपने में समा ले। ऐसी पतंगबाजी कर कइयों ने काली कमाई से अपनी डूबी लुटिया संभाल ली। कुछ लोग भ्रश्टाचार की पतंगबाजी में महारथी होते हैं, तभी तो वे कभी हारते नहीं है और हर बार पहले से ही जीत, उनके हाथ होती है। प्रषिक्षित पतंगबाजी का ही जादू है कि तिहाड़ में पहुंचकर भी भ्रश्टाचारी बाजीगरी करामात कम नहीं होती। तिहाड़ के चक्कर के बाद तो भ्रश्टाचार पतंगबाजी ऐसी होती कि कोई माई का लाल, डोर काटने की हिम्मत जुटा नहीं पाता। इतना ही नहीं, काले चेहरे की पतंगबाजी भी जमकर होती है। काले चेहरे में सफेदपोष का ऐसा लेप लगा लो, उसके बाद काली पतंगबाजी में मषगूल हो जाओ, कोई पहचान कर बता दे। कौन है, जो काली कमाई के सहारे ᅤंचे नाम बनाने वाले का बाल बांका भी कर ले। काली पतंगबाजी की तस्वीर इतनी सफेद होती है कि कहीं से भी दाग नजर नहीं आती। जो बता दे, फिर उसकी खैर नहीं।
कई दौर की पतंगबाजी आसमान में देखने के बाद मुझे लगा कि मैं तो मकर संक्रांति के पवित्र पर्व पर परंपरा निभाने के मूड में था, लेकिन आसमान में जिस तरह पतंगबाजी की काली छाया नजर आई, उसके बाद मेरे मन से पतंगबाजी का षुरूर ही खत्म हो गया है। इस साल तो पतंग की डोर खींचने की ख्वाहिष ही खत्म हो गई है, क्योंकि डोर की पकड़ को भी महंगाई की मार पड़ी है, वहीं यह भी डर सताने लगा है कि कहीं मेरी पतंग, कोई भ्रश्टाचारी पतंग की भेंट न चढ़ जाए। इसलिए इस साल मैंने ठान ली कि ऐसी पतंगबाजी की भीड़ में षामिल नहीं होᅤंगा। अगले साल, जब मकर संक्रांति आएगी, तब देखूंगा कि अब, हालात सुधरे कि नहीं ?

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

‘ऐरे-गैरे’ की प्रतिक्रिया

एक बात तो है, जो ‘आम’ होता है, वही ‘खास’ होता है। अब देख लीजिए ‘आम’ को, वो फलों का ‘राजा’ है। नाम तो ‘आम’ है, मगर पहचान खास में होती है। हर ‘आम’ में ‘खास’ के गुण भी छिपे होते हैं। जो नाम वाला बनता है, एक समय उन जैसों का कोई नामलेवा नहीं होता। जैसे ही कोई उपलब्धि हासिल हुई नहीं कि ‘आम’ से बन जाते हैं, ‘खास’।
देख लीजिए, हमारे क्रिकेट के महारथी, ‘कैप्टन-कुल’ को। जब वे क्रिकेट की दहलीज पर कदम रखे तो उन्हें कोई नहीं जानता था, उनकी बस इतनी ही पहचान थी, जैसे वे आजकल बोले जा रहे हैं, ‘एैरे-गैरे’ की। परिस्थतियां बदलीं, दो-चार धमाल किया, हैलीकाप्टर शॉट की झलक दिखाई। फिर क्या था, बन गए ‘आम‘ से ‘खास’। क्रिकेटप्रेमी की एक बड़ी खासियत है, जब तक बल्ला बोलता है, तब तक इनकी जुबान मीठी होती है और जैसे ही बल्ला शांत होता है, उसके बाद जुबान इतनी कड़वी हो जाती है कि ‘खास’ की भी औकात ‘आम’ की हो जाती है।
हमारे ‘कैप्टन-कुल’ ने न जाने कई सीरीज जीतायी और देश के भरोसेमंद के साथ ही उपलब्धि वाले कैप्टन बन गए। क्रिकेटप्रेमियों ने भी उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया, लेकिन ‘चार दिन की चांदनी’ की तर्ज पर अब कैप्टन-कुल की कैप्टेंसी पर ही सवाल दागे जा रहे हैं। कई ‘ऐरे-गैरे’ भी कैप्टन-कुल का छिछालेदर कर रहे हैं। कोई कह रहा है, कैप्टन-कुल को कैप्टेंसी छोड़ देनी चाहिए, कई सीरीज हार गए। बरसों से बल्ला नहीं चला। हमारे क्रिकेटप्रेमी, कैप्टन-कुल को कहीं ये न सलाह दे दे कि जब बेहतर नहीं खेल सकते तो क्रिकेट को अलविदा कह दो। इससे पहले ही कैप्टन-कुल के गरम दिमाग से बातें निकलीं कि कोई ‘ऐरा-गैरा’ उनके खेल पर सवाल न खड़ा करे।
हम तो यही कहेंगे, कैप्टन-कुल साहब। आपकी नजर में आपको सिर पर बिठाने वाले क्रिकेटप्रेमी ‘ऐरे-गैरे’ हैं तो फिर आपकी पहचान बनाने वाले भी, यही ‘ऐरे-गैरे’ हैं। ऐसे में आपकी तो औकात उन करोड़ों ऐरे-गैरों से भी कम हैं, जिनकी आपके सामने कोई हैसियत नहीं है। हार के बाद झल्लाहट जरूरी है, लेकिन जो खुद को ‘कुल कैप्टन’ कहलावकर वाह-वाही लूटता हो, उनसे ऐसी उम्मीद भला कोई कर सकता है ? कैप्टन-कुल को ये शोभा नहीं देता, उन्हें तो कहना चाहिए। मुझमें जितना कीचड़ उछालना है, उछालो, क्या फर्क पड़ता है। क्रिकेट के नाम पर कई बार कीचड़ उछाले जाते रहे हैं, एक कीचड़, और सही।
खैर, क्रिकेटप्रेमी अपने मन की मर्जी के मालिक होते हैं, वे तो जिन्हंे भगवान मानते हैं, उन्हें रास्ते से हट जाने की दुहाई दे देते हैं, फिर ‘कैप्टन-कुल’ की क्या बिसात, जिनका दिमाग कभी भी बिफर जाता है ? हालांकि, ये सब बातें, ‘ऐरे-गैरों’ को समझ में आती, तो फिर वे भूख-प्यास के साथ क्यों क्रिकेट देखते। क्यों अपनी दिन खराब करते ? क्यों सिर खपाते क्रिकेट की किचकिच में ? किसी की, जब कोई नुमाइंदगी करता है तो निश्चित ही उसके सामने, ऐसे लोगों की हैसियत ‘ऐरे-गैरे’ की ही होती है। अब तो इन ‘ऐरे-गैरों’ को भी ‘आम’ से ‘खास’ बने, ‘कैप्टन-कुल’ की सुध छोड़ ही देनी चाहिए, फिर पता चलेगा कि आखिर कौन है, ऐरा-गैरा ? मैं भी ‘ऐरा-गैरा’ ही हूं, मैंने तो अपना काम कर दिया और आप, कब करेंगे ?

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

मीठी बातों का फसाना

‘मीठी बातें’ किसे पसंद नहीं होती। हर कोई मीठी बातों का मुरीद होता है। हों भी क्यों नहीं, डायबिटीज, भले ही हो जाए, भला कोई मीठे से परहेज करता है। कहीं मीठा दिखा नहीं कि आ गया, मुंह में पानी। ऐसा ही है, मीठी बातों का फसाना, जिसके आगे-पीछे केवल मिठास का ही बिन सुनाई देता है, जिसके आगे कोई सांप नहीं नाचता, बस नाचता है तो मन मोर। मीठी बातों के आगोश में हर कोई समाना चाहता है। चाहे वह बातें क्यों न, तन-मन में कड़ुवाहट घोल दे। क्या कहें, मन की चंचलता के आगे कहां कोई ठहरता है। जो मन को काबू में कर ले, वह तो मीठी बातों की चरम सीमा को पार पा ही लेता है।
अब देख लो, हमारे नेताओं को। चुनाव आते ही मुंह से ‘मीठे बोल’ निकल पड़ते हैं और निगाहें ऐसी होती हैं, जैसी ‘मीठी बरसात’ हो जाए। आलम यहीं नहीं रूकता, मीठी-मीठी घोषणाओं से मन को रमने की कोशिश होती है और हम उन्हें पांच साल के लिए वोट की ‘मीठी बोतल’ थमा देते हैं, मगर उस मीठी बोतल से हमारे नेताओं को चढ़ जाता है, नशा का शुरूर। जिसे उतरने में लगता है, फिर पांच साल।
देश में जिन्हें हमने सरकार चलाने की जिम्मेदारी दी है, वे क्या, कम मीठी बातें करते हैं। महंगाई को सौ दिनों में खत्म करने की मीठी कहानी, आज भी कानों में गूंजती है। न जाने, वो ‘सौ दिन’ कब पूरे होंगे, जिसके बाद महंगाई ‘डायन’ से निजात मिल सके। सरकार की मीठी बातें सुनने की जैसी आदत हो गई है। गैस सिलेण्डर में सब्सिडी घटाने की ‘कड़वी बातें’ सुनने के बाद सरकार पर गुस्सा आ गया। जिनके पहले कार्यकाल में जो मीठी बातें कही गई थीं, वो बातें सपने बनकर ही रह गई हैं। शायद, सरकार के एक महाशय को पता चला होगा कि देश का आम आदमी उनके इस निर्णय से कितना परेशान है। इन बातों के उधेड़बुन में खबर आई कि अब गैस सब्सिडी बढ़ाई जाएगी। सरकार की मीठी बातें सुनंे, एक अरसा बीत चुका था, लिहाजा मन को बहुत सुकून मिला, क्योंकि मीठी बातें निश्चित ही किसी दवा की खुराक से कम नहीं होती, जो शरीर के लिए संजीवनी का काम करती हैं। महंगाई के कारण शरीर की जिन नसों में जकड़न आ चुकी थी, गैस सब्सिडी बढ़ाने की मीठी बात से उसमें नई जान आ गईं।
इतना तो है कि गरीबी के कई झटके के बाद, आम आदमी मीठी बातें भूल सा जाता है, उन्हें याद होती हैं तो बस ‘दो जून रोटी’ की बातें। फिर भी सरकार की मीठी बातों पर वह पूरा विश्वास करते नजर आता है। आजादी के बाद से मीठी बातों का जो फुहार शुरू हुई है, वह आज तक नहीं रूकी है। गरीबों को इन मीठी बातों से कितना लाभ हुआ, वो तो ‘हाड़मांस’ होते गरीबों और दुबराए जा रहे हमारे कर्णधारों को देखकर ही पता चल जाता है।
मीठी बातें निश्चित ही प्रिय होती हैं। जीवन में इसकी जरूरत भी है, लेकिन हर तरफ जिस तरह मीठी बातों का फसाना शुरू हुआ है, उसके बाद मीठी बातें भी अब कड़वी समझी जाने लगी हैं। मीठी बातों के भी दो अर्थ निकाले जाने लगे हैं, ये तो अर्थ निकालने वाले के नजरिये पर निर्भर होता है। इससे ही समझा जा सकता है कि मीठी बातों में कितनी गहराई छिपी है। ये तो, ‘मीठी बातों के सागर’ में डूबकी लगाने वाले की सहनशीलता की बात है। लगता है, ऐसी सहनशीलता ‘गरीबों’ के ही बस की बात है।

रविवार, 3 जून 2012

पानी रे पानी...

निश्चित ही पानी अनमोल है। यह बात पहले मुझे कागजों में ही अच्छी लगती थी, अब समझ भी आ रहा है। गर्मी में पानी, सोने से भी महंगा हो गया है, बाजार में दुकान पर जाने से ‘सोना’ मिल भी जाएगा, मगर ‘पानी’ कहीं गुम हो गया है। मेरे लिए तो फिलहाल सोने से भी ज्यादा कीमत, पानी की है, क्योंकि पानी को ढूंढने निकलता हूं तो दिन खप जाता है और वह गाना याद आता है...पानी रे पानी...तेरा रंग कैसा...। पानी के बिना वैसे तो जिंदगी ही अधूरी है और ऐसा लग भी रहा है, क्योंकि पानी ने जिंदगी से दूरी जो बना ली है। सुबह से शाम, पानी की चिंता में ही गुजरती है, ऊपर से पेट्रोल ने उसमें छोंक डालने का काम किया है। ऐसे में हम जैसे आम आदमी करे तो क्या करे ? बड़े लोग तो ढूंढकर पानी खरीद लेते हैं, हम जैसे अनगिनत लोग क्या करें, जिन्हें ‘पानी’ ढूंढने से भी नहीं मिल रहा है। हम हाथ मलते ही रह जाते हैं।
गरीबी से वैसे तो सभी चीजें रूठी रहती हैं, अब पानी ने भी मुंह मोड़ लिया है। अपनी इतनी औकात तो है नहीं, जो रोज-रोज ‘पानी’ को अवकात बता सकें। इसलिए दिन भर पानी की राह ताकते रहते हैं। जब उनका मन करता है, नजर आ जाता है, नहीं तो समा जाता है, भू-तल में। इसमें हम जैसों का क्या कसूर। जो पानी से थोड़ी बहुत विनती कर बैठते हैं, मगर वह नहीं सुनता, बस सुनता तो पैसों वालों की और हर जगह सुलभ हो जाता है। गरीबों के हाथ, जिस तरह कुछ ठहरता नहीं, वैसा ही पानी भी दूर फटकता है। नजदीक जाओ, मुंह ऐंठ लेता है। मनाने लगो, त्योरियां चढ़ा लेता है।
इतना कुछ होने के बाद भी मन इसलिए मसोस लिया जाता है, गरीब ऐसे ही पीसने के बने होते हैं, जिनकी जिंदगी के हिस्से में ऐसे ही नजारे सुखद होते हैंे।
अब मैं मूल बात पर आता हूं। जब से सूरज ने तपिश बढ़ाई है, उसके बाद मेरा जीना मुहाल हो गया है। उनकी तपन बर्दास्त हो जाती है, लेकिन पानी की दूरियां नहीं। मैं सुबह से शाम तक बस एक ही चिंता में रहता हूं कि पानी मिलेगा कि नहीं...मिलेगा तो कैसे...नाराज होकर दूर तो नहीं चला जाएगा.. ऐसी ही बातों को सोच-सोचकर मन हैरान-परेशान रहता है। मन, केवल पानी के पीछे भागते रहता है। लेखक मन है, फिर भी लिखने का मन नहीं करता, कुछ सुझता ही नहीं, गर्मी में मन तिलमिलाया हुआ है। मन बस यही कहता है, जब तक पानी नहीं, तब तक कुछ नहीं। सुबह उठो और लग जाओ, पानी की तिमारदारी में। यह सिलसिला देर रात तक नहीं थमता, क्योंकि पानी की खुशामदी जहां छोड़े, उसके बाद पानी भी कहां परवाह करने वाला रहता है।
हालात ऐसे हो गए हैं, बिना नहाए पहले आह्वान करता पड़ता है, पानी भगवान की जय हो... पानी भगवान की जय हो...। ऐसे ही आलाप चलते रहते हैं, तब कहीं जाकर ‘पानीदेव’ खुश होते हैं और फिर तय होता है कि कितने बूंद टपकाए जाएं...। एक-एक बूंद के लिए मिन्नतें करनी पड़ती है। कैसे भी करके बाल्टी भर कर बेड़ा पार लगाओ और इस जिंदगी को सफल बनाओ। मैं पानीदेव को खुश करने के लिए फरमाइश करता हूं कि आ जाओगो तो लड्डू भोग में चढ़ाऊंगा, फिर भी नहीं मानते। कहते हैं, पहले मेरा मोल तो समझो, उसके बाद ही मानूंगा। एक-एक बूंद टपकाने के बाद कहता है, अब कुछ समझ में आ रहा है, ...जल ही जीवन है, इसे व्यर्थ न बहाएं...।
‘पानीदेव’ ने मुझे लताड़ लगाते हुए कहा कि बारिश के समय तो मुझे लात मारते हो और गर्मी आते ही पूजा करने लगते हो, ऐसा नहीं चलने वाला ? मेरा मोल हर समय समझो, तब जाकर मैं खुश होऊंगा। फिर मैं पानी रे पानी... कहते ही साक्षात् प्रकट हो जाऊंगा और कोई आवभगत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब जाकर मुझे समझ में आया कि आखिर ‘पानीदेव’ की महिमा क्या है ?

रविवार, 29 जनवरी 2012

घोषणा ही तो है...

मैं बचपन से हीघोषणाके बारे में सुनते रहा हूं, परंतु यह पूरे होते हैं, पता नहीं। इतना समझ में आता है किघोषणाइसलिए किए जाते हैं कि उसे पूरे करने का झंझट ही नहीं रहता। चुनावी घोषणा की बिसात ही अलग है। चुनाव के समय जो मन में आए, घोषणा कर दो। ये अलग बात है कि उसे कुछ ही दिनों में भूल जाओ। जो याद कराने पहुंचे, उसे भी गरियाने लगो। यही तो है, ‘घोषणाकी अमर कहानी। नेताओं की जुबान पर घोषणा खूब शोभा देती है और उन्हें खूब रास आती है। यही कारण है कि वे जहां भी जाते हैं, वहांघोषणा की फूलझड़ीफोड़ने से बाज नहीं आते। लोगों को भी घोषणा की दरकार रहती है और नेताओं से वे आस लगाए बैठे रहते हैं कि आखिर उनके चहेते नेता, कितने की घोषणा फरमाएंगे।
बिना घोषणा के कुछ होता भी नहीं है। जैसे किसी शुभ कार्य के पहले पूजा-अर्चना जरूरी मानी जाती है, वैसे ही हर कार्यक्रम तथा चुनावी मौसम में ‘घोषणा’ अहम मानी जाती है। तभी तो हमारे नेता चुनावी ‘घोषणा पत्र’ में दावे करते हैं कि उन्हें पांच साल के लिए जिताओ, वे गरीबों की ‘गरीबी’ दूर कर देंगे। न जाने, और क्या-क्या। लुभावने वादे की चिंता नेताओं को नहीं रहती, बल्कि गरीब लोगों की चिंता बढ़ जाती है। वे गरीबी में पैदा होते हैं और गरीबी में मर जाते हैं। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक केवल घोषणा का शंखनाद सुनाई देते हैं। चुनाव के दौरान घोषणा का दमखम देखने लायक रहता है। नेता से लेकर हर कोई घोषणा की लहर में हिलारें मारने लगता है, क्योंकि ‘घोषणा’ ऐसी है भी।
मन में जो न सोचा हो, वह घोषणा से पूरी हो जाती है। घोषणा की बातों का लाभ न भी मिले, तो सुनकर मन को तसल्ली मिल जाती है। गरीबों की गरीबी दूर करने की घोषणा चुनाव के समय होती है, लेकिन यह सभी जानते हैं कि गरीब, सत्ता व सरकार से हमेशा दूर रहे और गरीबी के आगे नतमस्तक होकर गरीब ही घोषणा के पीछे गुम होते जा रहे हैं।
अभी उत्तरप्रदेश समेत अन्य राज्यों में चुनावी सरगर्मी तेज है। हर दल के नेता ‘घोषणा’ पर घोषणा किए जा रहे हैं। सब के अपने दावे हैं। घोषणा में कोई छात्रों की सुध ले रहा है, किसी में गरीबों की धुन सवार है। कुछ आरक्षण के जादू की छड़ी घुमाने में लगा है। जो भी हो, घोषणा ऐसी-ऐसी है, जिसे नेता कैसे पूरी करेंगे, यह बताने वाला कोई नहीं है। इसी से समझ में आता है कि घोषणा का मर्ज जनता के पास नहीं है। लैपटॉप के बारे में छात्रों को पता न हो, मगर नेताओं ने जैसे ठान रखे हैं, चाहे तो फेंक दो, घर में धूल खाते पड़े रहे, कुछ दिनों बाद काम न आ सके, किन्तु वे लैपटॉप देकर रहेंगे। शहर में रहने वाले ‘गाय’ न पाल सकें, लेकिन वे घोषणा के तहत गाय देंगे ही। ये अलग बात है कि उसकी दूध देने की गारंटी न हो और उसके स्वास्थ्य का भी। नेताओं की घोषणा भी ‘गाय’ की तरह होती है, एकदम सीधी व सरल। सुनने में घोषणा, किसी मधुर संगीत से कम नहीं होती, लेकिन पांच साल के बीतते-बीतते, यह ध्वनि करकस हो जाती है।
नेताओं को भी घोषणा याद नहीं रहती। वैसे भी नेताओं की याददास्त इस मामले में कमजोर ही मानी जाती है। जब खुद के हक तथा फंड में बढ़ोतरी की बात हो, वे इतिहास गिनाने से नहीं चूकते। घोषणा की यही खासियत है कि जितना चाहो, करते जाओ, क्योंकि घोषणा, पूरे करने के लिए नहीं होते, वह केवल दिखावे के लिए होती है कि जनता की नेताओं की कितनी चिंता है। घोषणा के बाद यदि नेता चिंता करने लगे तो जनता की तरह वे भी ‘चिता’ की बलिवेदी पर होंगे। घोषणा की परवाह नहीं करते, तभी तो पद मिलते ही कुछ बरसों में दुबरा जाते हैं। जनता को भी पांच साल होते-होते समझ में आती है कि आखिर ये सब जुबानी, घोषणा ही तो है... ?

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

क्रिकेट के नायक और खलनायक

इतना तो है, जब हम अच्छा करते हैं तो नायक होते हैं। नायक का पात्र ही लोगों को रिझाने वाला होता है। जब नायक के दिन फिरे रहते हैं तो उन पर ऊंगली नहीं उठती और जो लोग ऊंगली उठाते हैं, उनकी ऊंगली, उनके चाहने वाले तोड़ देते हैं। नायक की दास्तान अभी की नहीं है, बरसों से ऐसा ही चला आ रहा है। जब तक आप नायक हो, कोई कुछ नहीं कहेगा, साथ ही कहने वाले की खटिया खड़ी हो जाती है।
भारतीय क्रिकेट में भी इन दिनों चाहने वालों की नजर में ही उनके नायक, खलनायक बन बैठे हैं। बल्लेबाजों के एक बेहतरीन शॉट देखने वाले आंखफोड़ाऊ दर्शक भी टीवी के सामने से गायब है। कई तो टीवी सेट फोड़ बैठे हैं। जाहिर सी बात है कि जब टीवी तोड़ेंगे तो उनके नायक सहयोग के लिए आएंगे नहीं। इस तरह अपनी किस्मत भी फोड़ी जा रही हैं। वैसे में और भी मुश्किल है, जब नायक, खलनायक बन बैठा हो। आस्ट्रेलिया में जिस तरह भारतीय क्रिकेट व खिलाड़ियों की किरकिरी हो रही है और दमखम रखने वाले बल्लेबाजों की काबिलियत पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बीच ऊंगली तोड़ने वाले ही ‘ऊंगली’ उठाने लगे तो फिर...।
ऐसे में मुझ जैसे क्रिकेट के प्रशंसक को भी दुख हो रहा है, लेकिन मैं सोच भी रहा हूं कि कुछ समय के अंतराल में कैसे, कोई ‘भगवान’ से ‘शैतान’ बन जाता है ? क्रिकेट के ‘भगवान’ भी खलनायक माने जा रहे हैं। ‘दीवार’ में भी दरारें पड़ने की बात कही जा रही है। ‘वेरी-वेरी स्पेशल’ को खस्ताहाल कहा जा रहा है। ‘मिस्टर कुल’, का ठंडे में भी तापमान गिर गया है। फैंस, क्रिकेट के ‘सरताज’ के सिर से ‘ताज’ उतारने पर आमादा है। ऐसा हाल, मैंने कई बार देखा है कि खिलाड़ियों को नायक बनाकर फिदा हुए जाते हैं, फिर खलनायक बनाकर पुतले जलाए जाते हैं और पोस्टर फाड़े जाते हैं।
हमें यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि इन्हीं नायकों ने कई उपलब्धियां दिलाई हैं, वर्ल्ड कप जिताएं हैं और न जाने कितनी बार विदेशी जमीं पर बादशाहत साबित की हैं। रिकार्ड पर रिकार्ड बनाए हैं, यह क्या कम है, हमारे लिए। देश का नाम रौशन करने में कोई कोताही नहीं बरती। इस स्थिति में हमें नायकों के दुख की घड़ी में साथ होना चाहिए।
देश के क्रिकेट फैंस को क्या हो गया है, जो ‘बूढे़ शेरों’ को बल देने के बजाय पीछे हो जा रहे हैं। मेरी नजर में यह बिल्कुल गलत है। जब हालात ‘भगवान’ के खराब चल रहे हैं तो उनके साथ हमें होना चाहिए। ये अलग बात है कि हम अधिकतर कहते रहते हैं कि ‘भगवान’ हमारे साथ हमेशा होते हैं, मगर अभी स्थिति ऐसी है कि हमें ‘भगवान’ के साथ खड़ा रहना है। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि यही खिलाड़ी अपना बल्ला घुमाते थे तो हम खाना भूल जाते थे। जब ये हारते हैं तो हम रोते हैं। यहां तक गुस्से में टीवी सेट को फोड़ डालते हैं। क्रिकेट के चक्कर में बीवी से अनबन हो जाती है। उनके कारण बरसों से ‘फैंस’ दुबले हुए जा रहे हैं। फिर भी वे नायक, आज खलनायक बन बैठे हैं। हमें विचार करना चाहिए, कहीं हम गलत तो नहीं ? हम भाग्य पर विश्वास करते हैं, जरूर उनका ‘भाग्य’ साथ नहीं होगा। नहीं तो मजाल, कोई हमारे दमदार खिलाड़ियों को आऊट करके दिखाए। वे मैदान में उतने ही चिपके रहते हैं, जितना बरसों से टीम में चिपके हुए हैं।
क्रिकेट के ‘भगवान’ का महाशतक देखने के लिए आंखें पथरा गई हैं। महीनों से एक ही धुन सवार है कि कब ‘भगवान’ अपने बल्ले से ‘एक शतक’ टपकाएंगे, लेकिन ‘शतक का रस’ बल्ले की शाखाओं से टपक ही नहीं रहा है। अब क्या कहें... उन्हें जो समझ लें...।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

जूते और थप्पड़ का कमाल

जूता, जितना भी महंगा हो, हम सब की नजर में मामूली ही होता है और उसकी कीमत कुछ नहीं होती। जूता चाहे विदेश से भी खरीदकर लाया गया हो, फिर भी उसे सिर पर तो पहना जाता है और ही रखा जाता है। जूते तो बस, पैर के लिए ही बने हैं। जैसे, ओहदेदार लोगों के लिए कुछ लोग जूते के समान होते हैं, वैसे भी जूते का वजन, कहां कोई तौलता है। अभी देश में खास किस्म के जूते कभी-कभी नजर जाते हैं, जिनकी अहमियत के साथ पूछपरख भी होती है। यह जूते भी उतना ही मामूली होते हैं, जितना बाजार में मिलने वाले जूते। ऐसे कुछ जूतों की खासियत होती हैं कि उसकी पहचान, कुछ विशेष लोगों से जुड़ जाती हैं। जूते की प्रसिद्धि इसकदर बढ़ जाती है, जिसके सामने नामी-गिरामी कंपनी के जूते भी बौने साबित होते हैं।
पहली बार जब विदेशी धरती पर जूता उछला, उसके बाद जूते, जूते नहीं रहे, बल्कि रातों-रात ही यह ऐसे महान वस्तु बन गया, जिसका अब तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। मीडिया ने तो जूते की महिमा ही बढ़ा दी। जूता उछलने के बाद इस तरह महिमामंडन किया गया, उसके बाद जूता, जूता नहीं रहा। अब तो जूते का धमाका हर कहीं होने लगा है। जूते की खुमारी ऐसी छाई कि हमारे देश मंे एक नहीं, बल्कि कई जूते उछाले गए व फेंके गए। देखिए, जूते जमाने से मामूली माने जाते रहे हैं, उछालने वाला भी मामूली व्यक्ति होता है, लेकिन जिन पर उछाला जाता है, वह नामचीन होते हैं। जूते के साथ ही मीडिया की मेहरबानी से वे व्यक्ति भी दिन-दूनी, रात-चौगनी की तर्ज पर इतना नाम कमा लेते हैं, जिसके बाद उन जैसों का नाम जुबानी याद हो जाता है। इस तरह वह ‘जूता वाला बाबा’ साबित होते हैं।
जूते की कहानी तो सुन ही रहे थे, जब थप्पड़ की धुन चल रही है। किसी को एक थप्पड़ पड़ी नहीं कि दूसरा कहता है, बस एक ही...। थप्पड़ का दर्द वही जान सकता है, जिसने महसूस किया हो। जिस तरह महंगाई का दर्द आम जनता सहती है, मगर उसका अहसास कहां किसी को होता है ? गरीब, गरीबी में मरता है और उसकी आने वाली पीढ़ी भी बरसों सिसकती रहती है। कई तरह की मार गरीब भी खाते हैं, भ्रष्टाचार व महंगाई की मार ने तो लोगों का जीना ही हराम कर दिया है। इतना जरूर है कि आम जनता, थप्पड़ का दर्द को नहीं जानती, क्योंकि वह पहले से ही गरीबी, महंगाई से कराहती रहती है, उसके बाद दर्द बढ़ने का पता कहां चल सकता है ?, दर्द सहने की आदत जो बन गई है।
जिन्ने कभी दर्द ही नहीं सहा हो, वह जान सकता है कि वास्तव में किसी तरह की मार की पीड़ा क्या होती है ?
देश में पहले जूते का शुरूर सवार था, अब थप्पड़ ने अपनी खूब पैठ जमा ली है। जनता भी थप्पड़ की धमक को हाथों-हाथ ले रही है। जूते व थप्पड़ का कमाल ऐसा चल पड़ा है कि महंगाई व भ्रष्टाचार की मार का दर्द भी सुन्न पड़ गया है। अब क्या करें, माहौल ही ऐसा बन गया है, जहां केवल जूते व थप्पड़ के ही चर्चे हैं।